शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012














हरा ::

उनकी हरियाली अमृत है
मौसम का
उनकी आश्वस्ति से आश्वस्त है मौसम

पतझड़ जानता है
कि उसके दुःख को सहलाने निकल आएगी लाल कोंपल
एक झड़ा हुआ पत्ता मिट्टी की सुगंध है
एक गिरा हुआ बीज मिट्टी की गोद में बैठा शिशु
एक अनागत पौध तथागत को छाया देता पीपल .

हरा रंग मौसम का निर्वाण है .
मुक्त है हर किसलय दुःख से .


हरे में होता है समय का पुनर्जन्म
मरे हुए पेड़ के छल्ले कहते हैं युग की गाथा .
युग में घूमती है धरती
धरती को हथेलियों में संभाले है
वृक्ष की एक जड़ .

बृहस्पतिवार, 26 अप्रैल 2012

खोना ::























खेलता हुआ बच्चा
खो जाता  हैं
रेत उसे याद करती है
छूते हुए आहिस्ता सलोनी त्वचा की सलवटें
जिनमें छिपा है
पेड़ का गिल्ली डंडा बनना
पत्तों और हवा की छिपन -छुपायी


बहुत सारे  शहतूत मीठे झरते हैं
और बच्चा खो जाता है पेड़ की खोह में .


रेत को खोह की तलाश है .





लड़का खो जाता है
प्रेम करते हुए
नदी उसे याद करती है
लहरों के रुमाल से पोंछती हैं आंसू
आंसुओं में घुल जाता है केवड़ा


केवड़े की सुगंध महुए के पास जाती है
महुए के पास बचे हैं लोक गीत
लोक गीतों के हाथ अनगढ़ छेदों वाली बांसुरी


बांसों के गीले झुरमुट
सूख जाते हैं जेठ में
और लड़का खो जाता है धूप के किसलय  में


नदी को किसलय  की तलाश है .



जूझता हुआ आदमी
खो जाता है लड़ते हुए
पर्वत उसे याद करता है
पत्थरों पर टिका देता है कुहनी
साफ़ करता है बहता हुआ खून
पर बांधता नहीं उस पर पट्टी


थोड़ी सी मिट्टी किरकिरी
मलता है

और चल देता है सागर के पास 

मछलियाँ भाग रही हैं
उनके पीछे कई कश्तियाँ हैं रास्ता खोजती
कश्तियों के थके हाथ डूबे हैं पानी में
पानी डूब रहा है अतल में
अतल में खो गया आदमी


पर्वत को अतल की तलाश है .



अब न वह खेलता है
न करता है प्रेम
संघर्षों को उतरने नहीं देता स्मृति के शीशे में
वह खोया नहीं . वह खोया  नहीं .


रेत उसे देखती है
छूती है नदी
पर्वत और सागर उसके सामने बौने हुए अब


कोई नहीं जाता उसे खोजने
फिर भी एक गठरी बांधे बैठा है वह
यात्रा में रहते हुए रहती है इसकी जरुरत
जरुरत के तौर पर बंधी है गाँठ
पेंच नहीं इसमें
पनौतियों  और आशीर्वाद के गूदड़
खोलता है
सिलता है 

टाँकता है 
सहेजता है
और एक दिन कच्चा धागा आकाश का टूट जाता है


आकाश खोजता है सूई  के छेद में आकृति


हंस उड़ रहा है दूर छेद से  बाहर
आकाश अपनी चादर से ढांपता है नंगे हंस को
तलाशते हुए फूल


सूरज दे देता है आग .
धरती बची हुई नमी लिए कुछ नहीं कहती .










शनिवार, 18 फरवरी 2012

कवि ::


कवि ::

उसका दिल देह में कहाँ होता है

देखती हूँ उसे

कभी रात के सन्नाटे में
बिना मिजराब बजा रहा होता है
न जाने कौनसी दुनिया का सितार
कि बहने लगता है अँधियारा
और जब गुज़र जाता है पास से कोई दुःख का
गहरा बादल

तो चाँद को ढांपता एक न दीखने वाला इन्द्रधनुष छिटक जाता है

चांदनी के पास .

वह अरब की रेत में अपनी राख से

ढूंढ़ता है इंसानियत की गंध
किसी काली औरत के जिस्म में रहता  है
 काली पीढ़ी बनकर
तब उसका रंग कुछ और लाल होता है तंज़ानिया के गहरे गुलाब की तरह
और उसकी खुशबू से
डर जाती है सभ्यताएँ .

देखती हूँ उसे

कि किसी सितारे से ले आता है मोरचंग , मृदंग , पखवाज
या समय की भूली एक बहुत पुरानी बीन
जिस पर टंकी होती हैं भारत की इबारत
छिपाते हुए अपने ज़ख्म
 वह बैजू बावरे सा भटकता है
दिल के हाथों में लिए ध्रुपद ग्वालियर की गलियों में

वह कहीं भी हो सकता है ,कहीं भी

 जादुई उत्तरी रोशनी के बीच से गुज़रता
अफ्रीका की घास को सहलाता
बांधता है प्रेम की साफ़-साफ़ पट्टियाँ

किसी भी भाषा में उसका होना

रिसता हुआ दिल है
जो रहता है अपनी देह के बाहर
कवि होकर .


रविवार, 12 फरवरी 2012


पतझर ::

बहुत दूर जाते हुए
अपने अकेलेपन में
मैंने सुनी
पत्तों के गिरने की आवाज़
अपने ही शून्य में
देखे जलते हुए पलाश

तितलियों के गिरते रंगों की आहट में

बेचैन फूलों का रुदन
धरती के सबसे ऊँचे पहाड़ के धंसने की आवाज़
चुपचाप फिसलती बर्फ को
सागर में गिरते सुना मैंने

प्रार्थनाओं की बुदबुदाहट के बीच

सुनी गिरते हाथों की आवाज़
झुके सिर
और कातर झरता हुआ मौन
 आज की रात दूर बहुत दूर
किसी अकेले सितारे के पास
मैंने सुनी
दुनिया के गिरने की आवाज़

लेकिन कोई था बहुत शांत बहुत शांत

जिसकी बांसुरी पर
टिक गया था गिरता पतझर

और बहुत दूर  , बहुत दूर से आते देखी

फूलों की बारात .








बुधवार, 7 दिसम्बर 2011

चाबी ?


 चाबी ?

एक पुरानी सप्तपदी के अंतिम श्लोक के हाँ के साथ
कई चाबियाँ गुच्छे में पता नहीं कितने तालों की
बंधी रहती हैं पल्लू से .
कौनसे ताले में कहाँ लगनी हैं ..

एक गुफा जो खोल देती हूँ किसी दिन

सूरज की लालटेन हाथ में लिए दाखिल होती हूँ
एक बंद नदी खुलती है
साइप्रेशिया से ढकी
पास में जंगली शहद और इजराइलियों के लिए संभाला मैना
पत्थर की देह में हारे हुए कुछ योद्धा
और एक विकल आवाज़
सुनती हूँ किसी पुरुष ने गहरे प्रेम में आकर चार बार चुम्बन लिया
पत्थर हिले, चीखे
"ला बैला डेम सांस मर्सी "
कीट्स की हारी हुई एक कविता अट्ठारवीं सदी की .

मैं ताला बंद करती हूँ जादू की गुफा का

ओरांव , मुंडा , भील , ख्मती , खोवा ,संथाल , खारिया
जंगल बदल जाते हैं काले जिस्मों में
जिस्म काली चिड़िया में
चिड़िया आकाश में
और आकाश पुराने ताले में बंद चुप पड़ा है औरतों के साथ .

मैं भी हूँ वहीँ कहीं .

इसकी चाबी ?

शुक्रवार, 4 नवम्बर 2011

पापा की रेल::























पापा की रेल::

पापा रेल किस छावनी पड़ी है ?
पटरियां तो अंतहीन हैं
देखो चल दी रेल .
धुमक -धुमक .

पापा देखो कैसे उड़ रहा है आकाश उन कतारों के पीछे
हिला रहा है अपने हाथ .
 छोटी-छोटी कश्तियों की कतार  बिल्लौरी आँखों -सी सजग
सधे हुए चप्पू से दो पंख लिख रहे हैं उलटबासियाँ क्षितिज की पीठ पर
जैसे मैं लिखती हूँ काली स्लेट पर अपना नाम .

और बना देती हूँ फुर्र से उड़ती चिड़ियों का चम्बा
एक झोपड़ी , जिसके सिर पर रखा है चिमनी का ताज
पास से बह रही होती है नदी
खिले होते हैं आस-पास बुरुंश यूँ ही
और पार्श्व में पापा खड़ा होता है नदी की ऊँगली पकडे नीला पहाड़
वह तुम होते हो न पापा .

बाहर इन पेड़ों को क्या हुआ पापा ?
ये भी दौड़ रहे हैं अपनी पगडण्डी पर
इन्हें कांटें नहीं चुभते क्या ?
ये अधूरा चाँद और आसमानी आकाश
सब भाग छूटे हैं पापा किसी कैद से ?

पापा, कैद कैसी होती है ? सोने की या लोहे की ?
अभावों की या सन्नाटे की ?
उज्जड  या सहमी हुई ?
या फिर रेलगाड़ी के डिब्बे जैसी ? इंजन में फंसी ? लतर-लतर पटरियों पर चलती ?
और कैदी ?
देखो , माँ चुप करा रही हैं , पापा .

पापा , उन बादलों को देखो ..
एकदम जैसे माँ की आँखें
चोरी से पोंछ लेते हैं आँसूं

और ये खिड़की ..
माँ का दिल
चुप-चुप झांकती है दुनिया
रेल को समेटे हुए अपने बदन में
कहाँ जाएगी ये ?
किसने इसे काट कर यहाँ लगा दिया, पापा ?
तुम्हारी आँखें गोल हैं और इसकी चौरस .. क्यों ?


पापा , माँ कहती है तुम सब जानते हो क्योंकि तुम्हें सब पता है .
दुनिया पता है . उसका नक्शा पता है .
हर गली पता है
और पता है, अकसर क्यों नहीं बोलती है माँ ?

मुझे जानते हो क्या ?
किस पर पड़ी हूँ ?
माँ जैसी हूँ  ?
तुमसे तो अलग ही हूँ बहरहाल , ये मैं जानती हूँ . हुबहू खुद के जैसी हूँ .

लो मेरी गलबहियाँ ...
इस बार तुम्हें थामे रेलगाड़ी के आगे निकल जाऊँगी
फैला दूंगी बिस्तर , सामान -असबाब
उस सड़क पर जो मेरी अनंत यात्रा से सिकुड़ी -तिकुड़ी तक रही है खुद को .
और मेरी थकान सो जायेगी हँसते हुए बेहिसाब धुंध भरी शाम में .

पापा सुनाओ न लोरी , जो माँ गाती है .
कितना चुप रहते हो पापा ..

लल्ला -लल्ला लोरी
दूध की कटोरी
उड़न खटोले बैठ गुड़िया चंदा के घर जायेगी
ठुम्मक  -ठुम्मक नाच दिखा के मन सबका बहलाएगी ...

पापा , रहने दो . लोरी से नींद कहाँ आती है ?
केवल होता है शोर रेलगाड़ियों के नाचने का .
मेरे अन्दर भी शोर है . शोर है काफ़िर का
जिसकी शक्ल काबुलीवाले जैसी
दरवेश -सा घूमता , बांटता है सुख की किशमिश और मेवे
किस गली में खो जाएगा वह , ये दादी जानती हैं पापा .

और मेरे बाहर एक शोर ,डरा हुआ मूर्तिपूजक
खुद को ढालता , बनाता हुआ मंदिरों के लायक .
खूब नचाता है शोर .

पापा धरती भी ऐसे ही नाचती है क्या ? ठुम्मक -ठुम्मक ?

जैसे चाबी की गुड़िया ?
बोलो कितने बरस से घूम रही है धरती ?

बस एक ये ही नहीं जानते पापा .
मेरी आँखों में शिकायत नहीं है .

प्रश्नों की एक सरल जीभ उग आई है जंगली घास जैसी ..
पापा , शरद में नहायी दूब है
नरम-नरम
इसके स्पर्श में आश्वस्ति है . छूकर देखो तो ज़रा .

अपर्णा

बुधवार, 5 अक्तूबर 2011

अच्छा लगा::

 























अच्छा लगा::

अच्छा लगा, तुम मेरी भक्ति करते हो

भागवत में मेरा रूप उसकी आत्मा है
"आत्मा तू राधिका तस्या"

द्वापर में मैं एक युग
उसका प्रेम
विरह से मैं भयभीत नहीं हूँ .

गीत गोविन्द में मैं ठहरी स्वकीया रास
निम्बार्क तक आते-आते
चैतन्य की लय में एक बावला संगीत

आज मैं कुछ बदल गई हूँ

इधर यमुना का जल भी सड़ने लगा है
धोबी  घाट हो गयी हैं नैतिकताएं
खुद को कूटती-फछीटती

  इनसे अलग न मैं हूँ राधा , न कृष्ण .

आजकल एक आकांक्षा जोर मारने लगी है
देख आऊं मंदिर के बाहर मैं कहाँ -कहाँ हूँ
हूँ भी या नहीं
कोई झूठ-मूठ की किंवदंती तो नहीं हूँ ?
तुम्हारी फैलाई अफवाह ..

किसी रिसाव में मेरी सान्द्र आत्मा घुट रही हो शायद
उसे बचा लूँ पहले

हो सकता है कहीं मेरी ही चीख सुनाई दे और तुम पहचान न पाओ
उसे चुप करा दूँ तनिक 

संभव है सिद्ध न कर सकूँ अदालत में बार-बार हुए बालात्कार
उसके ज़ख्म ... कभी न हंसने वाली आह !

और भी कुछ घट सकता है मेरे साथ

मुझे धूल उड़ाता देख तुम धिक् कहो
ऐश ट्रे में झड़ी आखिरी राख के पास कोई उँगलियाँ नहीं
शिनाख्त का तो प्रश्न कहाँ रह जाता है .

एक बच्ची भी तो हो सकती हूँ मैं
थपक -थपक तुम्हारी दी गुड़ियों से खेलती संतुष्ट

चिड़ियों का चंबा हूँ
इस बार तुमने जाल के बहाने आकाश ही फैला दिया

अच्छा लग रहा है फिर भी यूँ सड़कों पर बेदोस्त घूमना
अपनी परछाईं लांघना
कविता की भाषा में कहूँ तो चाँद -तारे तोड़ना

एक बार देख लूँ मंदिर की मूरत
राधारानी हैं न ये ..

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