बुधवार, 7 दिसम्बर 2011

चाबी ?


 चाबी ?

एक पुरानी सप्तपदी के अंतिम श्लोक के हाँ के साथ
कई चाबियाँ गुच्छे में पता नहीं कितने तालों की
बंधी रहती हैं पल्लू से .
कौनसे ताले में कहाँ लगनी हैं ..

एक गुफा जो खोल देती हूँ किसी दिन

सूरज की लालटेन हाथ में लिए दाखिल होती हूँ
एक बंद नदी खुलती है
साइप्रेशिया से ढकी
पास में जंगली शहद और इजराइलियों के लिए संभाला मैना
पत्थर की देह में हारे हुए कुछ योद्धा
और एक विकल आवाज़
सुनती हूँ किसी पुरुष ने गहरे प्रेम में आकर चार बार चुम्बन लिया
पत्थर हिले, चीखे
"ला बैला डेम सांस मर्सी "
कीट्स की हारी हुई एक कविता अट्ठारवीं सदी की .

मैं ताला बंद करती हूँ जादू की गुफा का

ओरांव , मुंडा , भील , ख्मती , खोवा ,संथाल , खारिया
जंगल बदल जाते हैं काले जिस्मों में
जिस्म काली चिड़िया में
चिड़िया आकाश में
और आकाश पुराने ताले में बंद चुप पड़ा है औरतों के साथ .

मैं भी हूँ वहीँ कहीं .

इसकी चाबी ?

24 comments:

  1. इसकी चाभी ? ... नहीं मिलती .... वैसे मैं गुम हूँ इन भावों में, चाभी की ज़रूरत नहीं

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  2. एक अच्‍छी कवि‍ता के लि‍ए बधाई अपर्णा....।

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  3. भूगोल और इतिहास का समन्वय लिए प्रेरक कविता है।

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  4. अद्भुद शब्द चित्र....चित्रलिखित कर गए...

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. कल 08/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    http://nayi-purani-halchal.blogspot.com

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  8. कल 09/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    पिछले कमेन्ट मे गलत तारीख देने के लिए क्षमा चाहता हूँ।

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  9. Aparna ji .. jab bhi aapki kavita pado to kahi gahrai me utar jaata hai mann..adbhut rachna..

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  10. bahut gehen abhivyakti hai....jitni samajh paayi acchhi lagi...jo n samajh payi use samjhne ki utsukta bani rahi.

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  11. पत्थर की देह में हारे हुए योधा........और आकाश पुराने ताले में बंद चुप पडा है औरतों के साथ.. मैं भी हूँ वहीँ कहीं .. अपर्णा मनोज... समय-समय पर आपकी उपस्तिथि दर्ज होती रही है! और हर बार की तरह यह कविता भी मन को सपर्श करती है..! अद्भुत! कई तालों की चाबी है गुच्छों में...पर कौन सी चाबी है....बंद गुफा की...जिसमे बंद है आकाश.. जिसमे समाहित सारी सृष्टि (क्योंकि उसमे मैं भी हूँ वहीँ कहीं), खुद अपने को बंद पाए....! चाबी ढूँढने की उत्सुकता में छोड़ दिया आपने..!

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  12. अपर्णा की यह कविता प्राचीन काल में ले जाती है.मगर औअरत किसी भी युग में हो,लगभग समान अनुभवों से ही गुजराती है.अलग रंग और बिम्ब की सुन्दर कविता.

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  13. मानसिक द्वन्द का अद्भुत चित्र खींचा है आपने......
    बहुत ही विचारोत्तेजक कविता....

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  14. कविता का भावार्थ मन की गहराई की छूता है. बेहतरीन रचना के लिए बधाई.

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  15. …………(¯`O´¯)
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    My greetings from France! After visiting your blog, I could not leave without putting a comment.
    I congratulate you on your blog!
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    My blog is in french, but on the right is the Google translator!
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    cordially
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  16. आपके शब्द, देर तक स्पंदित करते हैं मन को

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  17. अच्छा चित्रण....
    बधाई ...
    मेरी नयी कविता तो नहीं उस जैसी पंक्तियाँ "जोश "पढने के लिए मेरे ब्लॉग पे आयें...
    http://dilkikashmakash.blogspot.com/

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