चाबी ?
एक पुरानी सप्तपदी के अंतिम श्लोक के हाँ के साथ
कई चाबियाँ गुच्छे में पता नहीं कितने तालों की
बंधी रहती हैं पल्लू से .
कौनसे ताले में कहाँ लगनी हैं ..
एक गुफा जो खोल देती हूँ किसी दिन
सूरज की लालटेन हाथ में लिए दाखिल होती हूँ
एक बंद नदी खुलती है
साइप्रेशिया से ढकी
पास में जंगली शहद और इजराइलियों के लिए संभाला मैना
पत्थर की देह में हारे हुए कुछ योद्धा
और एक विकल आवाज़
सुनती हूँ किसी पुरुष ने गहरे प्रेम में आकर चार बार चुम्बन लिया
पत्थर हिले, चीखे
"ला बैला डेम सांस मर्सी "
कीट्स की हारी हुई एक कविता अट्ठारवीं सदी की .
मैं ताला बंद करती हूँ जादू की गुफा का
ओरांव , मुंडा , भील , ख्मती , खोवा ,संथाल , खारिया
जंगल बदल जाते हैं काले जिस्मों में
जिस्म काली चिड़िया में
चिड़िया आकाश में
और आकाश पुराने ताले में बंद चुप पड़ा है औरतों के साथ .
मैं भी हूँ वहीँ कहीं .
इसकी चाबी ?
इसकी चाभी ? ... नहीं मिलती .... वैसे मैं गुम हूँ इन भावों में, चाभी की ज़रूरत नहीं
प्रत्युत्तर देंहटाएंएक अच्छी कविता के लिए बधाई अपर्णा....।
प्रत्युत्तर देंहटाएंजिन्दा कविता ..जादू si..
प्रत्युत्तर देंहटाएंचाबी वाले,
प्रत्युत्तर देंहटाएंसंग खड़े,
तालों के पाले।
भूगोल और इतिहास का समन्वय लिए प्रेरक कविता है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंअद्भुद शब्द चित्र....चित्रलिखित कर गए...
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प्रत्युत्तर देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंकल 08/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
प्रत्युत्तर देंहटाएंधन्यवाद!
http://nayi-purani-halchal.blogspot.com
कल 09/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
प्रत्युत्तर देंहटाएंधन्यवाद!
पिछले कमेन्ट मे गलत तारीख देने के लिए क्षमा चाहता हूँ।
चमत्कृत करती हुई रचना!
प्रत्युत्तर देंहटाएंAparna ji .. jab bhi aapki kavita pado to kahi gahrai me utar jaata hai mann..adbhut rachna..
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut gehen abhivyakti hai....jitni samajh paayi acchhi lagi...jo n samajh payi use samjhne ki utsukta bani rahi.
प्रत्युत्तर देंहटाएंकहां मिलती है चाबी....उम्दा
प्रत्युत्तर देंहटाएंपत्थर की देह में हारे हुए योधा........और आकाश पुराने ताले में बंद चुप पडा है औरतों के साथ.. मैं भी हूँ वहीँ कहीं .. अपर्णा मनोज... समय-समय पर आपकी उपस्तिथि दर्ज होती रही है! और हर बार की तरह यह कविता भी मन को सपर्श करती है..! अद्भुत! कई तालों की चाबी है गुच्छों में...पर कौन सी चाबी है....बंद गुफा की...जिसमे बंद है आकाश.. जिसमे समाहित सारी सृष्टि (क्योंकि उसमे मैं भी हूँ वहीँ कहीं), खुद अपने को बंद पाए....! चाबी ढूँढने की उत्सुकता में छोड़ दिया आपने..!
प्रत्युत्तर देंहटाएंअपर्णा की यह कविता प्राचीन काल में ले जाती है.मगर औअरत किसी भी युग में हो,लगभग समान अनुभवों से ही गुजराती है.अलग रंग और बिम्ब की सुन्दर कविता.
प्रत्युत्तर देंहटाएंमानसिक द्वन्द का अद्भुत चित्र खींचा है आपने......
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत ही विचारोत्तेजक कविता....
कविता का भावार्थ मन की गहराई की छूता है. बेहतरीन रचना के लिए बधाई.
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut hi bhavpud samvednsheel kavita
प्रत्युत्तर देंहटाएंवाह ...बहुत ही बढि़या।
प्रत्युत्तर देंहटाएं…………(¯`O´¯)
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My greetings from France! After visiting your blog, I could not leave without putting a comment.
I congratulate you on your blog!
Maybe I would have the opportunity to welcome you on mine too!
My blog is in french, but on the right is the Google translator!
good day
cordially
Chris
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MERRY CHRISTMAS TO YOU AND YOUR FAMILY
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आपके शब्द, देर तक स्पंदित करते हैं मन को
प्रत्युत्तर देंहटाएंअच्छा चित्रण....
प्रत्युत्तर देंहटाएंबधाई ...
मेरी नयी कविता तो नहीं उस जैसी पंक्तियाँ "जोश "पढने के लिए मेरे ब्लॉग पे आयें...
http://dilkikashmakash.blogspot.com/
चमत्कृत करते हुए शब्दचित्र।
प्रत्युत्तर देंहटाएं